बिना कफ़न के
सड़क के किनारे पड़ी
लाश- मेरी है

चारो ओर बैठ कर
रोते बच्चे भी मेरे हैं
लोग मर कर रोते हैं
मुझे देखो
खुश हूँ मैं
बहुत खुश
इतनी जितना , जीते जी
कभी रही नही
न कभी भोजन मिला
न आवास
तन ढकने को कपडे

बमुश्किल मय्यसर होते थे
कभी पेट भर खिला न सकी
बच्चे मेरे दाने- दाने को
रहे तरसते
मैं तन बेचकर भी
बुझा न सकी पेट की ज्वाला
आज मुक्त हूँ मैं
पापी पेट से
बच्चों के बोझ से
किसी की फिकर नही
खुश हूँ मैं
बहुत खुश



















