रविवार, 26 अप्रैल 2009

सवारी



इन खाली गाड़ियों में बैठना पसंद करेंगे? तो देर किस बात की जल्दी से सवार हो जाओ

फ़िर हुई शुरूआत




सोच रही थी मेरे इस ब्लॉग को मेरी और मुझे इसकी जरुरत तो है। और इसलिए इसे बरक़रार रखना ही चाहिए । इस सोच के साथ इसकी नई शुरूआत

शुक्रवार, 20 फरवरी 2009











आज हनी का तर्पण है। कर्म कांड पूर्ण .

बृहस्पतिवार, 18 दिसम्बर 2008



अपार दुःख के साथ सूचित करना पर रहा है कि जिस हनी के नाम पर मैंने अपना ब्लाग शुरु किया था उसकी मृत्यु हों गइ. अब उचित तो यही होगा कि मैं एक दुसरा ब्लाग बनाउ. अब इस ब्लाग पर कोई पोस्त नही करूँगी. नए ब्लाग का इंजार कीजिये.
नए शुरुआत के लिये सभी ब्लागर सथिओ का सहयोग अपेक्षित है.

सोमवार, 24 नवम्बर 2008

कवि व्यथा !!!




(१)
देश स्वतंत्र है
कवि आज भी है
परतंत्र
कलम उसकी है बंधी
विवशताओं से घिरा
हो गया है लाचार
कलम के साथ-साथ
जकडा है मन
लिखता है वो
जो लिखवाते हैं
कहता है वो
जो कहलवाते हैं
यहाँ तक कि
सोचता भी वही है
जो लोग चाहते हैं
देख-देख सबकी दुर्दशा
चुप रहता है
ऊपरी ख़ुशी में जीता है
(२)
प्रेयशी के गाल
मुझे नहीं दिखते लाल
उसकी जुल्फें
न बादलों कि झलक देती हैं
न रातों कि
उसके बालों का पानी
याद नहीं दिलाता
मोतियों कि
उसकी कजरारी आँखें
हिरनी सी दिखती नहीं
उसके मुख को,मैंने दी नहीं
चाँद कि उपमा
मैं करता हूँ चेष्टा
पर उसकी वेणी
नागिन की समता
पा नहीं सकती
जब-जब देखता हूँ उसे
दिखती है मानवी ही
क्या मेरा कवि होना व्यर्थ है?
(३)
कवि होना
है एक अभिशाप
इनकी है अलग दुनिया
समाज से कटे
अपने-आप में सिमटे
रहते हैं ये
हर वास्तु को देहते हैं
इतने गौर से
कि थम जाती हैं
उनकी साँसें
लोग कहते हैं
ये दूर-दूर रहते हैं
और
ये कहते हैं
लोग पास नहीं आते
खैर, इसी मुगालते में
दोनों एक-दुसरे से कट जाते हैं!

शनिवार, 25 अक्तूबर 2008